सोमवार, 14 अगस्त 2017

कार्यालयीन हिंदी : स्वरूप एवं प्रयोग

 दिनांक 26 जनवरी 1950 ई० को भारत एक गणतन्त्र देश बना । किसी भी स्वतंत्र देश की आधिकारी राष्ट्रभाषा उसके मान और गौरव को बढ़ाती है । भारत के संविधान के भाग 17 के अनुच्छेद 120,210 एवं 343 से 351 तक संघ की भाषा एवं इसके विभिन्न प्रावधानों के बारे में चर्चा की गयी है ।इन उपबंधों के आधार पर संघ की राजभाषा के रूप में हिन्दी के प्रयोग को मान्यता दी गयी है । गृह मंत्रालय की दि. 27 अप्रैल, 1960 ई० की अधिसूचना संख्या 2/8/60-रा.भा., की अधिसूचना के आधार पर राष्ट्रपति का आदेश आम जानकारी के लिए प्रकाशित किया गया जिसमें लोकसभा के 20 सदस्यों और राज्य सभा के 10 सदस्यों की एक समिति प्रथम-राजभाषा आयोग की सिफारिशों पर विचार करने लिए और उनके विषय में अपनी राय राष्ट्रपति के समक्ष पेश करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 344 के खंड (4) के उपबंधों के अनुसार नियुक्त की गई थी। समिति ने अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति के समक्ष 8 फरवरी, 1959 को पेश कर दी। इन रिपोर्टों के आधार पर देश की राजभाषा के रूप में हिन्दी को प्रतिष्ठित किया गया । तदनुसार 1963  ई० में राजभाषा अधिनियम बना जिसे बाद में संशोधित रूप में पुनः 1967 ई० में प्रकाशित किया गया । राजभाषा संकल्प 1968 ई० एवं राजभाषा नियम 1976 ई० का निर्माण हुआ । इन नियमों एवं अधिनियम के निर्माण का मुख्य उद्देश्य देश की राजभाषा के रूप में हिन्दी को मान्यता एवं इसके क्रियान्वयन के लिए विभिन्न उपबंधों एवं उपायों का समावेश करना था । कतिपय कारणों से हिन्दी को राष्ट्र भाषा के रूप में अबतक मान्यता नहीं मिल सकी है पर राजभाषा के रूप में समस्त सरकारी कामकाज में विशेषकर केंद्रीय सरकार के कार्यालयों में इसके प्रयोग पर बल दिया जाता है तथा यह अपेक्षा की जाती है कि इसके प्रयोग,प्रचार एवं प्रसार के लिए समस्त कर्मचारी प्रयास करेंगे।

भाषाई आधार पर राज्यों का विभाजन : कार्यान्वयन में सुविधा की दृष्टि से भाषाई आधार पर भारत को क्रमशः ‘क’, ‘ख’ एवं ‘ग’ तीन भागों में विभाजित किया गया है । ‘क’ क्षेत्र के राज्यों में बिहार, छत्तीसगढ, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और केंद्र शासित क्षेत्र दिल्ली तथा अंडमान और निकोबार द्वीप समूह आते हैं । ‘ख’ क्षेत्र में गुजरात, महाराष्ट्र और पंजाब राज्य तथा चंडीगढ़, दमण और दीव तथा दादरा और नगर हवेली संघ राज्य क्षेत्र हैं तथा उपरोक्त ‘क’ तथा ‘ख’ क्षेत्र के अतिरिक्त अन्य सभी राज्य ‘ग’ क्षेत्र में आते हैं । सरकारी कार्यों के लिए पत्राचार हेतु इन राज्यों में विभिन्न लक्ष्य निर्धारित किये गए हैं । इन लक्ष्यों के आधार पर यह अपेक्षित है कि ‘क’ एवं ‘ख’ क्षेत्र के राज्यों के केंद्रीय सरकार के कार्यालय आपस में जो भी पत्राचार करें वह शत प्रतिशत हिन्दी में किया जाए तथा ‘ग’ क्षेत्र के कार्यालयों के लिए यह लक्ष्य  60 प्रतिशत पत्राचार का है । ‘क’ क्षेत्र के कार्यालयों से ‘ग’ क्षेत्र के कार्यालयों को भेजे जाने वाले पत्र हिन्दी में हो सकता है पर यह अपेक्षा की जाती है कि उनका अंग्रेजी अनुवाद भी साथ में भेजा जाए ।

सरकारी कार्यालयों में पत्राचार का स्वरूप :  केंद्रीय सरकार के सरकारी कार्यालयों में विभिन्न स्तरों पर पत्राचार हेतु विभिन्न स्वरूप प्रचलन में हैं । किसी कार्यालय में कार्यालय के कार्मिकों को कोई जानकारी देने के उद्देश्य से जारी किए जाने वाले पत्र को परिपत्र(circular) कहा जाता है । किसी एक शाखा से दूसरी शाखा से पत्राचार के लिए प्रयुक्त स्वरूप को अनौपचारिक टिप्पणी कहा जाता है । एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय में भेजा जाने वाला पत्र कार्यालयीन पत्र कहा जाता है । इसके अतिरिक्त किसी कर्मचारी को यदि कोई विशेष प्रकार का अनुदेश दिया जाना हो तो उसे ज्ञापन के रूप में निकाला जाता है जो व्यक्ति विशेष को संबोधित होता है । इन समस्त पत्रों का स्वरूप एक दूसरे से भिन्न होता हैं  । भारत सरकार के राजभाषा अधिनियम 1963 के धारा 3(3) के अनुसार पत्राचार के कुल 14 ऐसे स्वरूप हैं जिन्हें आवश्यक रूप से द्विभाषी रूप में जारी किया जाना अपेक्षित है । वे कागजात हैं -1.सामान्‍य आदेश  2.संकल्‍प 3.नियम 4.प्रेस विज्ञप्ति 5.अधिसूचना 6. प्रशासनिक एवं अन्‍य रिपोर्ट 7. सूचना 8. निविदा प्रारूप 9. संविदा 10. करार 11.अनुज्ञप्ति 12.अनुज्ञापत्र 13.संसद में प्रस्‍तुति हेतु प्रशासनिक एवं अन्‍य रिपोर्ट एवं 14.संसद में प्रस्‍तुति हेतु शासकीय कागजात। ऐसे कागजात को मात्र अंग्रेजी में जारी करना राजभाषा अधिनियम के उपबंधों का उल्लंघन माना जाता है । किसी भी कार्यालय में राजभाषा अधिनियम के उपबंधों के अनुपालन की ज़िम्मेदारी कार्यालय प्रमुख की होती है । कतिपय मामलों में राजभाषा अधिनियम के उपबंधों का अनुपालन हर हाल में सुनिश्चित करना अपेक्षित है । इसके अतिरिक्त यह भी अपेक्षित है कि हिन्दी में प्राप्त पत्रों का उत्तर हिन्दी में ही दिया जाए ।

राजभाषा अधिनियम के उपबंधों का कार्यान्वयन एवं उसका प्रचार प्रसार : राजभाषा अधिनियम के लागू होने तक या इसके कार्यान्वयन के लिए बनाए गए उपबंधों में यह भी उल्लेख है कि हिन्दी के साथ साथ सह भाषा के रूप में अगले 15 वर्षों तक अंग्रेजी का प्रयोग जारी रहेगा । इस प्रावधान के कारण अधिकांशतः सरकारी कार्यालयों में हिन्दी का कम प्रयोग हुआ तथा अंग्रेजी का प्रचलन बदस्तूर जारी रहा। सरकारी कार्यालयों में नौकरी पर नियुक्त होने वाले कार्मिकों को काम करने के लिए अलग से कोई प्रशिक्षण नहीं दिया जाता है । उन्हें मात्र परिवीक्षा पर कुछ समय के लिए रखा जाता है । अब जब काम करने की आवश्यकता पड़ी तो अधिकांश कर्मचारी फाइलों में पड़े पूर्व के संदर्भों को देखते हुए उसी के समरूप पत्राचार का प्रयास करते गए । चूंकि प्रत्येक सरकारी विभाग के फाइलों में अधिकांश पत्राचार अंग्रेजी में होने के कारण कार्मिक अंग्रेजी के पत्राचार को ही पराश्रय देते चले गए । सरकारी कार्यालयों में हिन्दी के कार्यान्वयन में यह काफी बाधक है । हिन्दी का ज्ञान रखने वाले कार्मिकों को दो वर्गों में विभाजित किया गया है । मैट्रिक या उसकी समतुल्‍य या उससे उच्‍चतर परीक्षा हिंदी के साथ उत्‍तीर्ण कार्मिक को हिन्दी का कार्यसाधक ज्ञान प्राप्त कार्मिक माना जाता है । विभिन्न स्तरों पर हिन्दी का प्रशिक्षण देने के लिए भारत सरकार द्वारा कार्मिकों को हिन्दी का प्रशिक्षण दिया जाता है । हालांकि हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए भारत सरकार के राजभाषा विभाग द्वारा समय-समय पर विभिन्न उपाय किया जाता है जिसके अंतर्गत विभिन्न प्रकार के प्रशिक्षण का आयोजन तथा उन प्रशिक्षण पाठ्यक्रम को पास करने पर वेतन वृद्धि एवं एक मुश्त नकद पुरस्कार का प्रावधान,हिन्दी में कार्य करने पर कैलेंडर वर्ष एवं वित्त वर्ष की समाप्ति पर नकद पुरस्कार का प्रावधान किया गया है । इन प्रयासों के अतिरिक्त सरकारी कार्यालयों में राजभाषा अनुभाग द्वारा त्रैमासिक प्रशिक्षण का आयोजन तथा हिन्दी कार्यान्वयन की प्रगति की देख-रेख के लिए कार्यालय प्रमुख की अध्यक्षता में तिमाही बैठक का आयोजन किया जाता है ।

कार्यालयीन हिन्दी का स्वरूप : भाषा का मुख्य उद्देश्य है अपनी बात सामने वाले से या जिसके लिए प्रयुक्त हो उसे आसानी से समझाई जा सके वह आसानी से ग्राह्य हो । समस्त उपबंधों के होते हुए भी आम लोगों में यह धारणा है कि हिन्दी का प्रयोग कठिन होगा क्योंकि साहित्यिक हिन्दी अपेक्षाकृत कठिन होता है और यदि इस हिन्दी का प्रयोग आम पत्राचार में किया जाए तो हास्यास्पद या समझने में कठिनाई आएगी । शायद इसी भ्रम के आकरण लोग हिन्दी को अपनाने से कतराते हैं । इस समस्या के निजात के लिए भारत सरकार, राजभाषा विभाग द्वारा आसान हिन्दी के प्रयोग पर बल दिया जाता है । आसान हिन्दी का अर्थ है स्थानीय एवं आम बोलचाल कि भाषा का प्रयोग सरकारी कार्यों के लिए किया जाए । इस प्रकार से हिन्दी का प्रचलन बढ़ेगा । चूंकि हमारा देश  विभिन्न भाषा-भाषी समुदायों से युक्त है अतः आसान हिन्दी समझ पाना सबके लिए आसान होगा तथा क्षेत्र विशेष के प्रचलित शब्दों के प्रयोग से भाषा की धारा भी सुचारु रूप से चलती रहेगी तथा इससे हिन्दी का प्रयोग भी बढ़ेगा । आम तौर पर देखा गया है कि आसान शब्दों को ग्रहण करने में जितनी आसानी होगी उतनी ही कठिनाई एवं भारी भरकम शब्दों के साथ आएगी । जिन सरकारी कार्यालयों में इस विधि का अनुसरण किया गया वहाँ हिन्दी का प्रचार प्रसार अपेक्षाकृत अधिक ही हुआ । उदाहरणस्वरूप अंग्रेजी का शब्द approval के लिए हिन्दी के कई विकल्पों का प्रयोग किए जा सकते हैं जो अनुमोदन, संस्तुति आदि हो सकता है । यह भी प्रावधान किया गया कि यदि कोई कार्मिक हिन्दी लिखने में वर्तनी संबन्धित यदि कोई त्रुटि भी करता है तो उसे इस बात के लिए हतोत्साहित करने की बजाय प्रोत्साहित किया जाए कि उसने हिन्दी में लिखने का प्रयास तो प्रारम्भ किया ।
     
      कई बार ऐसा देखा गया ही कि अंग्रेजी में प्राप्त पत्रों को हिन्दी में अनूदित करवाने की आवश्यकता पड़ जाती है । अनुवाद करते समय अधिकांशतः लोग शब्दानुवाद का प्रयास करते हैं । शब्दानुवाद कुछ हद तक तो ठीक है पर जब हम यह अनुवाद आसानी से भाषा के कथ्य को समझने के लिए करते हैं तो कहीं कहीं शब्दानुवाद के कारण उस विषय का मूल अर्थ भारी और उबाऊ होने के साथ समझ से परे हो जाता है । ऐसे में यह सलाह दी जाती है कि भावानुवाद किया जाए तथा दिये गए अंग्रेजी पाठ के मूल कथ्य को प्रदर्शित किया जाए ताकि उसे समझने में आसानी हो तथा उसके अनुरूप पत्राचार किया जा सके । सरकारी कामकाज में पहले देखा गया है कि अंग्रेजी के कुछ ऐसे वाक्य होते हैं जिनका हिन्दी अनुवाद बड़ा ही कठिन लगता है या हिन्दी में उन शब्दों या वाक्यों का प्रयोग करना बड़ा ही अटपटा लगता है जैसे I am directed to say /I am directed to forward… ऐसा माना जाता है कि पत्र जारी करने वाला अधिकारी अपने से कुछ नहीं कर रहा है । वह सरकार के अनुदेश पर समस्त कार्य करता है इसी लिए हमेशा पत्राचार में यह वाक्य प्रयोग किया जाता है । इनका हिन्दी में अनुवाद मुझे यह कहने का निदेश हुआ है/मुझे.... अग्रेषित करने का निदेश हुआ है । अंग्रेजी के पत्र में सम्बोधन के लिए Dear Sir का प्रयोग होता है पर हिन्दी में महोदय लिखा जाता है । अंग्रेजी पत्राचार में Yours faithfully, लिखा जाता है पर इसके हिन्दी रूपमें आपका विश्वासी लिखना कतई उपयुक्त नहीं होगा । इसके स्थान पर हम भवदीय लिखते हैं ।

      कार्यालयों में आम पत्राचार के अतिरिक्त एक और चीज प्रचलन में है जिसे नोटिंग कहा जाता है। सरकारी कार्यालयों में कोई भी कार्य बिना फाइल पर टिप्पणी के नहीं की जा सकती । कार्य करने वाला सहायक कोई भी बात या अपने उच्चाधिकारी को फाइल पर नोट के रूप में लिखकर करता है । इसे अंग्रेजी में नोटिंग(Noting) कहा जाता है । उसकी बात पर उच्चाधिकारी द्वारा तदनुसार  कार्य करने का अनुदेश दिया जाता है । कार्यालय के पत्राचार का यह प्रथम सोपान होता है । अंग्रेजी में लिखे जाने वाले नोट अमूमन passive voice, third person के रूप में लिखे जाते हैं पर हिन्दी में सीधे सपाट शब्दों  में तथा आसान वाक्यों में लिखने पर बल दिया जाता है । उदाहरण के लिए नोट शीट में किसी बात को प्रस्तुत करने के लिए अंग्रेजी में Submitted please लिखकर शुरुवात की जात है हेसे मान लीजिये कार्यालय में दो कार्मिकों की कमी है । इस कमी को दूर करने के लिए मुख्यालय से दो कार्मिकों की मांग की जानी है । इसके लिए कार्य करने वाला सहायक फाइल में कुछ इस प्रकार से नोट प्रस्तुत करेगा :-
Submitted please
                  There is an acute shortage of staff in this office. To fill the deficiency HQ office may be requested to transfer two staff.

                  Submitted for your approval please.
इसे हिन्दी में प्रस्तुत करने के लिए निम्नलिखित रूप से लिखा जा सकता है :-

प्रस्तुत/प्रस्तुति
            हमारे कार्यालय में कार्मिकों की भारी कमी है । इस कमी को दूर करने के लिए मुख्या से दो कार्मिकों की तैनाती के लिए निवेदन किया जा सकता है ।

            अनुमोदनार्थ/अनुमोदन हेतु प्रस्तुत ।

      अंग्रेजी के वाक्यांश में यदि हम देखें तो please शब्द का खूब प्रयोग होता है । पर यह माना जाता है कि प्रशासनिक कार्यों में भावना का स्थान नहीं होता है अतः ऐसे शब्दों का पत्राचाट  में प्रयोग न किया जाए । सीधे एवं सपाट शब्दों में अपनी बात कही जाए। तदनुसात उच्च अधिकारी द्वारा भी तदनुसार अपनी टिप्पणी दी जाती है ।

नोटिंग के बाद ड्राफ्टिंग का क्रम आता है । ड्राफ्टिंग का अर्थ है किसी भी पत्र या विवरण का मसौदा तैयार करना । कोई भी पत्र या पत्राचार के लिए विवरण पहले उच्चाधिकारी द्वारा अनुमोदन करवाना आवश्यक होता है । इसके लिए सहायक द्वारा लिखा जाने वाला समस्त विवरण पत्र/ज्ञापन/परिपत्र के रूप में मसौदा उच्चाधिकारी के पास प्रस्तुत किया जाता है । उच्चाधिकारी द्वारा उक्त विवरण का अवलोकन करने के बाद उसमें या तो संशोधन का सुझाव दिया जाता है या  फिर उसका अनुमोदन कर दिया जाता है । तदनुसार पत्र के अंतिम स्वरूप को अधिकारी द्वारा हस्तक्षार करने के बाद कार्मिक द्वारा जारी कर दिया जाता है ।


      कार्यालयीन हिन्दी एवं अंग्रेजी में यदि हम अंतर देखें का प्रयास करें तो सदा यह सलाह दी जाती है कि आसान हिन्दी का प्रयोग करें । इसके लिए आपके मन में जो विचार आता है, या जो कहा जाना है उसे साफ एवं स्पष्ट शब्दों में प्रस्तुत करें । राजभाषा अधिनिय के उपबंधों के अनुसार हिन्दी में प्रस्तुत किए गए मसौदे या नोट के लिए कोई भी अधिकारी उसके अंग्रेजी अनुवाद की मांग नहीं कर सकता है । चूंकि बहुत कम लोग ही सीधे अंग्रेजी में सोचकर अपनी बात अंग्रेजी में ही लिख पाने में समर्थ होते हैं, अधिकांशतः आम भारतीय कोई भी बात अंग्रेजी में लिखने से पूर्व अपने मातृभाषा में सोचता है फिर उन शब्दों या वाक्यों को मन ही मन अंग्रेजी में अनूदित करने का प्रयास करता है । अब अनुवाद की प्रक्रिया में हमेशा व्याकरणिक शुद्धियों का ध्यान रखना पड़ता है । यदि थोड़ी सी अशुद्धि हो जाए तो अर्थ का अनर्थ हो जाने का अंदेशा रहता है । अंग्रेजी लिखने के इस प्रयास में अत्यधिक मानसिक श्रम करना पड़ता है । इसके इतर यदि हम हिन्दी में लिखने का प्रयास करते हैं तो हमें अधिक श्रम करने की आवश्यकता नहीं पड़ती है । हिन्दी में लिखने का सबसे बड़ा फाइदा यही है कि वाक्य संरचना में शब्दों की क्रम यदि आगे पीछे भी हो जाए तो वाक्य का अर्थ नहीं बदलता है । और फिर अपनी भाषा में अपनी बात कहना अधिक आसान होता है । हिन्दीतर भाषाई क्षेत्र के लोगों के लिए भी अपने मातृभाषा से अंग्रेजी की बजाय हिन्दी में कोई बात अनूदित कर कहना अत्यधिक आसान होता है । ऐसे में हिन्दी में सरकारी काम अत्यधिक आसान होता है । बस मन का डर दूर कर प्रयास करने की आवश्यकता है । 

गली-कूचा : विश्व के 20 आश्चर्य : माला वर्मा की नयी पुस्तक

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सोमवार, 17 जुलाई 2017

कर्मचारी राज्य बीना निगम के लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम में हिंदी टंकण: समस्या और निदान

कम्प्यूटर पर भारतीय भाषाओं का प्रयोग(यूनिकोड)

एक ज़माना था जब कम्प्यूटर तक मात्र गिने चुने लोगों की ही पहुंच होती थी | कम लोगों की पहुँच होने के कारण इसे अन्य लोगों में हौवा के रूप में भी देखा जाता था | बदलते समय के साथ कम्प्यूटर में ढेरों परिवर्तन आये साथ ही लोगों की कम्प्यूटर में पहुँच भी बढ़ी | पहले अंग्रेजी में ही काम करने की सुविधा थी पर अब धीरे-धीरे भारतीय भाषाओँ में भी कम्प्यूटर पर काम करने की सुविधा शुरू हो गयी | पर आज भी एक बड़ा तबका है जिनके लिए यह एक प्रकार से हौवा ही बना हुआ है जिसका लाभ उठाकर कई लोग अनापशनाप पैसे एवं श्रम खर्च करते हैं, कुछ विशेष ज्ञान अर्जित न हो पाने के कारण बीच में ही अपना प्रयास बंद कर देते हैं | आज हम कुछ ऐसे ही भ्रांतियों पर चर्चा करेंगे जिसमें मुख्य बिंदु कम्प्यूटर पर हिंदी सहित अन्य भारतीय भाषाओँ में काम करने के बारे में चर्चा की जाएगी |
यूनिकोड(Unicode)-इस क्रम में सबसे पहला हौवा है| अधिकांश लोग जिन्हे कम्प्यूटर पर हिंदी में काम करना पड़ता है उनके मुख से यह सुनने में आता है कि मेरे कम्प्यूटर में यूनिकोड नहीं है, कैसे हिंदी में काम किया जाएगा | यूनिकोड की शाब्दिक विवेचन यदि हम करें तो यह पाते हैं कि यह और कुछ नहीं बल्कि यूनिवर्सल कोड है जिसे यूनिकोड का नाम दिया गया है | कम्प्यूटर की कार्यप्रणाली को यदि हम देखें तो पाते है कि कम्प्यूटर बाइनरी सिस्टम में काम करता है | बाइनरी सिस्टम का अर्थ है कम्प्यूटर के जितने भी कमांड हैं वे सब 0(जीरो) और 1(वन) पर आधारित होते हैं | कम्प्यूटर इस जीरो और वन के अतिरिक्त कुछ भी नहीं समझता |
अब प्रश्न यह आता है कि यदि हमारा कम्प्यूटर जीरो और वन के अतिरिक्त कुछ भी नहीं समझता तो इतनी सारी चीजें कैसे करता है? कम्प्यूटर पर विभिन्न कार्य या आकृति के लिए इन्हीं जीरो और वन को विभिन्न कोड के रूप में चिन्हित किया जाता है | इन कोड़ों के सहारे कम्प्यूटर स्क्रीन पर हम मनचाही विभिन्न चीजें बना सकते हैं या लिख सकते हैं | कम्प्यूटर के की बोर्ड में जितने भी की हैं उनके लिए एक निश्चित कोड निर्धारित है | इन्ही से अक्षर या आकृति बनती है | प्रारम्भ में जब कम्प्यूटर का प्रादुर्भाव हुआ, उस समय कम्प्यूटर के लिए विभिन्न भाषा(Language) बना | एक कम्प्यूटर में प्रयुक्त होने वाली भाषा(सॉफ्टवेयर) यदि दूसरे कम्प्यूटर में नहीं है तो इनके बीच साझा की गयी सामग्री जंक या गार्बेज रूप में प्रदर्शित होगी | यदि आपको यह सामग्री देखनी है तो आपको उस कम्प्यूटर के सॉफ्टवेयर को अपने कम्प्यूटर में डालना होगा तभी आप सामग्री को देख या पढ़ पाएंगे | इस समस्या से निजात पाने के लिए विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों ने एक बैठक किया तथा यह प्रस्ताव पारित किया कि अब से जो भी सॉफ्टवेयर बने उसे ऐसा बनाया जाए कि उससे प्रोसेस की गयी सामग्री को पूरे विश्व के कम्प्यूटरों में देखने या पढ़ने में असुविधा न हो | इस बैठक के फलस्वरूप यूनिवर्सल कोडेड कैरेक्टर सेट(UCS) स्टैण्डर्ड का गठन हुआ | आज की तारीख में इसमें 136,755 कैरेक्टर हैं तथा 139 मॉडर्न एवं ऐतिहासिक भाषाएं शामिल हैं | सन 1987 में इस प्रक्रिया की शुरुवात हुई |

चूँकि भारत की राजभाषा हिंदी होने के कारण कुछ सरकारी दबाव तथा जनता की माँग पर कम्प्यूटर पर हिंदी प्रयोग के लिए विभिन्न संस्थाओं ने प्रयास प्रारम्भ किया | इस प्रयास के फलस्वरूप कई प्रकार के सॉफ्टवेयरों का विकास हुआ | जैसे कि लीप ऑफिस, योगेश इत्यादि | इन सॉफ्टवेयरों के निर्माण से हिंदी में काम करने की सुविधा कुछ-कुछ प्रारम्भ हो गयी | पर बात जस की तस रही | जिन कम्प्यूटरों में ये सॉटवेयर इंस्टाल होंगे उनमें ही इन्हे देखा और खोला जा सकता है | अन्य कम्प्यूटरों में यह गार्बेज बन जाते हैं | इन सॉटवेयरों को हम फॉण्ट भी कह सकते हैं | ऐसे फॉण्ट जो सिमित क्षेत्र या मात्र उसी कम्प्यूटर में काम करेंगे जिनमें ये इंस्टाल हों | इन्हे ट्रू टाइप फॉण्ट  कहा जाता है | ऐसे फॉण्ट में कृति देव, सुशा, योगेश, चाणक्य इत्यादि आते हैं | इन फॉण्ट से काम तो चल जाता है पर एक ऐसे प्रणाली की आवश्यकता थी जो यूनिकोड के नियमों पर आधारित हो | अर्थात पूरे विश्व में बेरोकटोक खुल सके | इस प्रकार के फॉण्ट को ओपन टाइप फॉण्ट  कहा गया | इन समस्यों के निजात के लिए भारत सरकार और कुछ संस्थाओं ने मिलकर भारतीय भाषाओँ के यूनिकोड स्वरुप का विकास किया | भारत एक विशाल देश है जिसमें विभिन्न प्रकार की भाषाएं प्रयोग की जाती हैं | सबसे कठिन कार्य था इन समस्त भाषाओँ के लिए किसी एक की बोर्ड का विकास करना जिससे एक ही की से समस्त भारतीय भाषाओँ के अक्षर टाइप किया जा सके | इस प्रयास में इन्स्क्रिप्ट की बोर्ड का विकास हुआ | एक ही की बोर्ड से भारत की 22 भाषाओँ में टंकण का कार्य किया जा सकता है | इसे भारत सरकार द्वारा पेटेंट करवाकर सबके लिए मुफ्त में प्रयोग के लिए दे दिया है | अब जब भी आप कम्प्यूटर खरीदते हैं उनमें यह की बोर्ड इनबिल्ट आता है | बस इसे सक्रिय करने की आवश्यकता होती है | आप भारत की जिस भाषा में काम करना चाहें अपने कम्प्यूटर से कर सकते हैं, अलग से कोई सॉफ्टवेयर डालने की आवश्यकता नहीं होगी |

अब हिंदी टंकण की विधि और प्रक्रिया के बारे में निम्नलिखित कुछ पंक्तियों में चर्चा की जा रही है |
टंकण के लिए दो प्रकार के तरीके प्रचलित हैं | प्रथम- फोनेटिक तथा द्वितीय- इन्स्क्रिप्ट या रेमिंग्टन/गोदरेज जैसा की बोर्ड |
इन्स्क्रिप्ट या रेमिंग्टन/गोदरेज जैसा की बोर्ड  – पूर्व में जब कम्प्यूटर का प्रचार नहीं था उन दिनों हिंदी टंकण के लिए टाइपराइटर का प्रयोग होता था | इन टाइपराइटरों पर विभिन्न क्रम में हिंदी के 'की(Key)' होते थे | इनके प्रयोग के लिए प्रशिक्षण आवश्यक है | आगे चलकर कम्प्यूटर के अंग्रेजी की बोर्ड के साथ इस टाइपराइटर के की बोर्ड को मिला दिया गया तथा कम्प्यूटर में हिंदी टंकण की सुविधा आरम्भ हो गयी | चूँकि यह प्रणाली कुछ कठिन सी है तथा बिना पूर्व प्रशिक्षण के इसपर कार्य कर पाना भी कठिन है अतः ज्यादातर लोगों में इसका प्रचलन कम ही हुआ |
इस समस्या से निजात पाने के लिए गूगल और माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियों ने फोनेटिक टंकण की सुविधा का प्रसार करना प्रारम्भ किया | इसके लिए आपको अपने कम्प्यूटर में एक सॉफ्टवेयर डाउनलोड कर इंसटाल करना होगा (google ime या microsoft Indic Input tool)| इन सॉफ्टवेयरों की मदद से आप रोमन हिंदी का प्रयोग कर हिंदी टंकण की सुविधा ले सकते हैं |जिस प्रकार से एसएमएस की भाषा में रोमन हिंदी लिखने के हम अभ्यस्त हैं, यह प्रणाली काफी कारगर साबित हुई तथा आज की तारीख में कम्प्यूटर से लेकर मोबाईल तक हर मशीन में हिंदी टंकण के लिए लोग फोनेटिक की बोर्ड का प्रयोग करने लगे हैं | इसमें यदि आपको राम लिखना हो तो आप  Ram लिखकर स्पेस बार दबा दें | आपकी शब्द हिंदी या मनचाही भारतीय भाषा में परिवर्तित हो जाएगी | इस प्रक्रिया को ट्रांसलिटेरेशन भी कहा जाता है | अर्थात जो भी अंग्रेजी में लिखें वह अन्य भाषा में परिवर्तित हो जाएगा |

अब तो इस तकनीकी में और भी विकास हुआ है तथा बोलकर लिखने की सुविधा आपके कम्प्यूटर एवं मोबाइल में आ गयी है | आप भाषा का चयन कर लीजिये तथा बोलते जाइये, आपका कम्प्यूटर या मोबाईल आपकी मनचाही भाषा में टंकण करता चला जाएगा | बाद में आवश्यकतानुसार आप इसमें शुद्धिकरण भी कर सकते हैं | गूगल डॉक्स में यह सुविधा उपलब्ध है जो ऑनलाइन है |इसके अतिरिक्त आप गूगल ट्रल्सलेट एप में भी बोलकर टाइप कर सकते हैं, आवश्यकतानुसार आप लिखे गए वाक्यांश को कॉपी कर मनचाही जगह पर पेस्ट कर अपना काम चला सकते हैं | जहांतक मोबाइल का प्रश्न है, एनरोइड मोबाइल में ऑनलाइन एवं ऑफलाइन दोनों प्रणालियों में यह सुविधा उपलब्ध है | मोबाईल में इस सुविधा को सक्रिय करने के लिए आपको 15 एमबी के एक सॉफ्टवेयर को डाउनलोड करना पडेगा | मोबाईल में इस सुविधा को सक्रिय करने के लिए आप सेटिंग में जाएँ  फिर Language & Input में जाएँ | वहां google Voice Typing ऑप्शन आएगा उसे क्लिक करें  | अगला ऑप्शन offline Speech Recognition ऑप्शन में manage Downloaded Languages.  ऑप्शन पर जाएँ तथा वहां अपनी मनचाही भाषा डाउनलोड कर लें(हो सकता है कुछ मोबाईल में इस प्रक्रिया में कोई फेर बदल हो, पर अमूमन हर सेट में यही प्रक्रिया होती है) | बस आप ऑफलाइन भी अपने मोबाईल में टाइप कर सकते हैं |

इस प्रक्रिया से आप अपनों से अपनी भाषा में जुड़ें एवं संपर्क करें, भारतीय भाषाओं को विलुप्त  होने से तभी रोका जा सकता है जब इसके वाहक इसका अधिक से अधिक प्रयोग करें | आइये कम्प्यूटर एवं मोबाइल में हम हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओँ को अधिक से अधिक अपनाएं एवं इनका प्रचार-प्रसार करें |      

शुक्रवार, 16 जून 2017

चने के भाव बिकती डिग्रियाँ : खरीददार चाहिए

कुछ दिनों से अखबारों में कलकत्ता के कई इलाकों में नकली डॉक्टरों के पकड़े  जाने की ख़बर आ रही है। वाकई में यह चिंताजनक खबर है कि मैट्रिक पास लोग भी एम.बी.बी.एस की नकली डिग्री के सहारे कई वर्षों से निर्विरोध चिकित्सा के व्यवसाय में लगे हुए हैं। इनमें से कई तो नामी अस्पतालों में नौकरी करते हुए भी पाये गए । निजी प्रैक्टिस भी खूब चल रही थी । जांच एजेंसियों के चक्कर में आने के बाद बड़े बड़े खुलासे होने लगे । अब इस प्रकार की घटनाओं से ज्यादा हैरान होने की बात नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में नकली शिक्षण संस्थानों की भी खूब बढ़ आई हुई है। अलग-अलग शहरों में बड़े बड़े प्रचार माध्यमों के द्वारा किसी भी डिग्री की परीक्षा पास करवाने की गारंटी सह प्रचार आपको दिख जाएगा। एक पड़ताल के दौरान यह पाया गया कि इन संस्थानों को आप एक निश्चित शुल्क दीजिये,कुछ ही दिनों में वे आपको मनचाही डिग्री मिल जाएगी,चाहे वह चिकित्सा के क्षेत्र की हो या अन्य कोई । कुछ वर्षों पहले हमारी भेंट ऐसे ही एक एजेंट से हुई। विभिन्न प्रकार की डिग्री के लिए भिन्न-भिन्न दर,आपको न तो परीक्षा देने जाना है न ही तो परेशान होने की जरूरत,डिग्री उनके घर से जाकर ले आये। कई राज्यों के विश्वविद्यालय से उनके तार जुड़े होने की बात सामने आई । आजमाने के लिए एक मित्र ने उनके साथ सौदा भी किया । बात 35 हजार रुपये में एम ए की डिग्री के लिए तय हुई । सब कुछ ठीक ठाक चला । डिग्री बड़े ही सुंदर कागज में छप कर आई। विश्वविद्यालय से इसे सत्यापन करने का भी उपाय बताया गया। हमने विश्वविद्यालय को पत्र भेजकर सत्यापन करना चाहा पर कोई जवाब नहीं आया। बाद में पता लगा कि वो सज्जन डिग्रियां घर मे ही छाप रहे हैं।शहर-दर-शहर गली कूचों में इस प्रकार के एजेंट मिल जाएंगे । ऐसे लोगों के झांसे में पड़कर कई युवक गुमराह होकर पैसे और समय खराब कर रहे हैं। ऐसे मामलों में ठगे गए लोग लोकलाज एवं शर्म से किसी को बताना जरूरी नहीं समझते। यह तो एक छोटा सा उदाहरण है। ऐसी घटनाओं से पूरा देश भरा पड़ा है, हर प्रकार की डिग्री दिलाने का वादा करते हुए मिल ही जाएँगे । पर ठगे जाने के बावजूद लोग कहीं शिकायत नहीं करते हैं। यह देश में एक ज्वलंत मुद्दा है । विद्यार्थी और सरकार दोनों की यह ज़िम्मेदारी बनती है कि ऐसे लोगों को नकेल कसें और ठगी को रोकें ।

रविवार, 9 अप्रैल 2017

हिंदी में विज्ञान-कुछ विशेष लिंक साभार राहुल खटे

केंद्र/राज्य सरकार के कार्यालयों में हिंदी के अधिकाधिक प्रयोग के लिए वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग द्वारा प्रकाशित पुस्तिका जिसकी कीमत सिर्फ ₹20/- हैं और इसे आप 50 प्रतिशत की छूट अर्थात सिर्फ प्रति कॉपी ₹10/-(डाक-व्यय अतिरिक्त) पर पर प्राप्त कर सकते हैं। आयोग ने इसका एक एंड्रॉइड ऍप भी लॉन्च किया है। जिसे आप इस लिंक से प्राप्त कर सकते हैं। https://play.google.com/store/apps/details?id=matrixdev.com.csttglossary

https://youtu.be/EAIIZrHwBik

[22/03, 8:45 PM] Rahul Khate. Hindi: http://hariraama.blogspot.in/2007/09/ramsetu-environmental-issues.html?m=0
[23/03, 9:18 AM] ‪+91 98199 83708‬: अरविंद कुमारः हिंदी का एक मौन महर्षि जिसके आगे हर हिंदी प्रेमी नतमस्तक है
http://hindimedia.in/arvind-kumar-a-silent-maharshi-of-hindi-in-front-of-which-every-hindi-boyfriend-is-a-knit/
[25/03, 9:11 AM] Rahul Khate. Hindi: http://vishwavahini.blogspot.in/2017/02/blog-post.html?m=0
[26/03, 11:43 AM] Rahul Khate. Hindi: विश्व पर्यावरण दिवस: http://airworldservice.org/hindi/archives/category/news-hindi/world-news-hindi
[26/03, 12:21 PM] Rahul Khate. Hindi: https://youtu.be/2to4pXFNclU
[26/03, 7:32 PM] Rahul Khate. Hindi: AMAZING TECHNOLOGY

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[29/03, 2:32 PM] Rahul Khate. Hindi: https://youtu.be/gRY_-a0O5LU
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गली-कूचा : अनुवाद में सही शब्द का चयन महत्वपूर्ण क्यों??

गली-कूचा : अनुवाद में सही शब्द का चयन महत्वपूर्ण क्यों??

अनुवाद में सही शब्द का चयन महत्वपूर्ण क्यों??

अनुवाद में उचित शब्द चुनना बहुत महत्वपूर्ण है:अनुवादक दूसरे भाषा में किसी विशेष भाषा के विचारों और सामग्री का अनुवाद करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। एक भाषा से दूसरे में शब्दों का रूपांतरण मजेदार हो सकता है, पर साथ उपयुक्त शब्द चुनना भी बहुत ही महत्वपूर्ण है । एक शब्द दूसरे भाषा में कई अर्थों का प्रतिनिधित्व कर सकता है इसलिए यह तय करना महत्वपूर्ण है कि किस शब्द को चुनना है जो टेक्स्ट और पर्यावरण के अनुकूल है। एक छोटी सी गलती केवल विचारों के सार को नहीं मार देती है बल्कि विवाद भी पैदा कर सकती है, और यदि ऐसा कुछ होता है, तो अनुवादक के कैरियर के यहां पटाक्षेप होने में समय नहीं लगता। हाल ही की एक घटना गौर करने लायक है जहां CBSE के कक्षा 12 के बायोलॉजी के अंग्रेजी प्रश्नपत्र ने पूरे देश मे  सोशल मीडिया के माध्यम से वर्तमान सरकार को कठघरे में खड़ा करने में देर नहीं किया।(संदर्भ टाइम्स ऑफ इंडिया,कलकत्ता एडिशन,दिनांक 09 अप्रैल 2017 पृष्ठ संख्या 7)।
राजनीति में न पड़कर यदि इस घटना की विवेचना करें तो पता चलेगा कि अनुवादक की एक गलती ने क्या से क्या कर डाला। इस एक घटना ने उस अनुवादक के कैरियर में कमोबेश कुछ तो बट्टा लगा ही दिया होगा।
यहाँ में भावी एवं वर्तमान अनुवादकों को यह सलाह देना चाहूंगा कि ऐसी गलती न हो उसके लिए आवश्यक है कि आप देश,काल,माहौल और परिवेश का ध्यान रखते हुए सटीक शब्द का चयन करें।

रविवार, 19 फ़रवरी 2017

दहशत

दहशत

      आज पूरा शहर दहशत में है  | हर तरफ आशंकाओं का माहौल | सभी डरे हुए अपने घरों में दुबके हुए हैं | कोई किसी से बात करने के लिए तैयार नहीं | अफवाहों का माहौल गरम है | हर मिनट नई नई खबर आ रही है | कभी यह खबर आती कि बाहर से हजारों की संख्या में जेहादी आक्रमण के लिए चल पड़े हैं , तो कभी खबर आती कि आज शाम को फिर से हमला होने वाला है | जितने मुंह उतनी बातें चल रही है |
      जबसे सर जी ने स्ट्राइक करवाया है तब से मोहल्ले की चैन गायब है | एक तरफ सीमा पर के प्रशंसक तो दूसरी तरफ देशभक्ति में सारोबार लोग | कल तक जो आपस में भाई भाई से लगते थे, एक साथ रहते थे , आज सरहदों के बवाल के चक्कर में अपने ही घर में बवाल मचा बैठे हैं |  दोनों दलों के छुटभैये कद्दवार नेता अपनी अपनी हांकने में लगे हुए हैं | कोई किसी से उन्नीस नहीं रहना चाहता | खुद को बीस बनाने के चक्कर में , अपनी अपनी कौम के रहनुमा बने युद्ध स्तर पर हिंसा अभियान को जारी रखे हुए हैं | अगर देखा जाए तो कुछ विशेष बात थी ही नहीं | विद्यालय में परीक्षा चल रही थी | एक छात्र नक़ल करते हुए पकड़ा गया और कक्षा से बाहर निकाल दिया गया | परीक्षा की समाप्ति के बाद विद्यालय के गेट के बाहर उस छात्र ने अपने कुछ दोस्तों के साथ मिलकर नक़ल रोकने वाले शिक्षक पर हमला कर दिया| शिक्षक के बचाव में कुछ लोग आगे आये , पर यह क्या!! उस छात्र को जैसे ही चपत पड़ी, उसने इसे साम्प्रदायिक रंग दे डाला | भागते हुए उसने ऐलान किया कि दूसरी कौम के लोग हमें मारना चाहते हैं | भागो …..|
उसके आवाज देते ही तलवारें खिंच गयीं, हथगोले और गोलियों की बौछार होने लगी | मास्टर जी किसी प्रकार से अपनी जान बचाकर भागे | आज इस घटना की बीते लगभग पंद्रह दिन हो गए पर तनाव में कोई परिवर्तन नहीं आया | सब परेशान हैं पर किसी से कुछ कह भी नहीं सकते |
 सड़क के एक कोने पर भोंदू चाय वाला एक छोटे से खोमचे में अपनी दूकान चलता हैं | उसके हाथों की चाय पीने के लिए हर कौम के लोग लालायित होकर आते थे, वहीँ बैठकर घंटों देश- दुनिया के हाल पर रायशुमारी करते थे | आज तो तब हद हो गयी जब कुछ लोग उसे पटक कर मारने लगे और उसका गला रेंतने का प्रयास  करने लगे  | कुछ लोगों ने इस कृत्य का विरोध किया तो उन्हें भी गालियां पड़ीं | किसी प्रकार से भोंदू को तो बचा लिया गया पर उसकी दूकान तबतक आग से जलकर ख़ाक हो गयी | चौराहे पर बैठा उसे जलते हुए देखता रहा | | उसके परिवार के जीविका  के साधन को लुटते देखता रहा |कुछ कर भी तो नहीं सकता था …........
 बूढ़े काका की एकमात्र सब्जी की दूकान थी मोहल्ले में, उसे भी लोगों ने जला दिया | काका भी भोंदू जैसा ही एक गरीब आदमी था जिसके आजीविका के सीमित साधन थे जिसे भीड़ ने नष्ट कर दिया |
पुलिस की  रेपिड एक्शन टीम आ चुकी थी | उन्होंने पास के तीन किलोमीटर के दायरे को सील कर दिया |ना कोई अंदर आ सकता था ना ही किसी को बाहर जाने की इजाजत थी | सारी दुकाने बंद हैं | बंद भला क्यों न हों |कौन है जिसे अपनी संपत्ति और अपनी जान प्रिय न हो |   कर्फ्यू के आज पंद्रहवां दिन है |दूध के लिए बच्चे तड़प रहे हैं | खाने पीने का समान सब कुछ ख़त्म हो चुका है | दहशत के मारे और कर्फ्यू में कोई भी दूकान खोलने के लिए राजी नहीं है | ना मश्जिद से आजान की आवाज आ रही है ना ही मंदिर से पूजा की घंटियों का | लगता है जैसे भगवान और खुदा दोनों ही इस झंझट से मर्माहत हो चुके इसलिए इनके बन्दे भी चुप हैं |