शुक्रवार, 16 सितंबर 2016

इतिहास के पन्नों से : रानी रासमणि

  भारत की वीरांगनाओं में पश्चिम बंगाल की वीरांगना रानी रासमणि का एक महत्वपूर्ण स्थान है | उन दिनों जबकि भारतीय समाज गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था | समाज के हर क्षेत्र में नारी उपेक्षित ही रहती थी, उन दिनों रानी रासमणि ने समाज सुधार एवं अंग्रेजों से लोहा लेने में किंचित मात्र भी संकोच नहीं किया | मध्य 19 वीं शताब्दी में पुरुष प्रधान समाज में उनका एक विशिष्ट दबदबा था | दिनांक 28 सितम्बर 1793 को पश्चिम बंगाल के वर्तमान समय के उत्तर 24 परगना जिला के कोना नामक ग्राम में उनका जन्म हुआ था |   उनके पिता एक प्रतिष्ठित जमींदार थे | 11 वर्ष की उम्र में उनका विवाह कलकत्ता के जान बाजार क्षेत्र के प्रतिष्ठित जमींदार बाबू राजाचंद्र दास से हुआ | पिता और पति के घर जमींदारी होने के कारण बचपन से ही उनके अंदर नेतृत्व क्षमता विद्द्मान थी | दयालु स्वभाव, धर्म में रूचि एवं भक्ति में आस्था उनके अंदर बचपन से भरा हुआ था | अल्पायु में ही वैधव्य का दुःख उनके ऊपर आन पड़ा | पति के देहांत के बाद पूरे जमींदारी का भार इन्होने अपने कंधे पर ले लिया |  बंगाल में विधवाओं की स्थिति उन दिनों काफी खराब थी तथापि अपने दूरदर्शिता, धार्मिक आस्था एवं लगन से समस्त नकारात्मक शक्तियों को पराजित करते हुए बड़े ही कुशलता पूर्वक उन्होंने जमींदारी का भार सँभालते हुए पुरुषों का नेतृत्व किया | पद्मिनि, कुमारी, करुणामयी और जगदम्बा नामक उनकी कुल चार बेटियां थीं, जिनमें से विवाह के दो वर्ष के बाद करुणामयी की मृत्यु हो गई | इन्हे कोई पुत्र नहीं था | 
     कहा जाता है कि माँ काली में विशेष आस्था के कारण स्वप्न में उन्हें दक्षिणेश्वर में माँ काली के मंदिर निर्माण की प्रेरणा मिली | इस प्रेरणा से सं 1855 में इस मंदिर का निर्माण हुआ | यह भी कहा जाता है कि गदाधर नामक एक पुजारी को दक्षिणेश्वर के इस काली मंदिर में पूजा अर्चना करने के लिए रानी रासमणि द्वारा नियुक्त किया गया था | कालांतर में चलकर यही गदाधर स्वामी रामकृष्ण परमहंस कहलाए | ऐसा नहीं कि उन्होंने मात्र मंदिरों का ही निर्माण करवाया हो | समाज के अन्य के क्षेत्र में भी उन्होंने विकास कार्य करवाया | उन्होंने तीर्थ यात्रियों की सुविधा के लिए सुवर्णलेखा नदी से पारी तक सड़क निर्माण करवाया, गंगा किनारे के घाट बनवाए जिनमें कलकत्ता का बाबूघाट प्रमुख है, जिसे उन्होंने अपने पति की याद में  बनवाया था | इम्पीरियल लाइब्रेरी जिसे वर्तमान समय में नेशनल लाइब्रेरी के नाम से जाना जाता है, हिन्दू कॉलेज जिसे अब प्रेसिडेंसी कॉलेज के नाम से जाना जाता है, उनके निर्माण के लिए भी उन्होंने काफी रकम का सहयोग दिया |

     ऐसे ही एक बार अंग्रेजी हुकूमत ने मछुवारों द्वारा गंगा में मछली पकड़ने पर कर लगवा दिया | कर न देने पर मछली पकड़ने की मनाही कर दी गई | इससे मछुवारों को काफी मुश्किल का सामना करना पड़ रहा था | मछुवारों की गुहार पर उन्होंने गंगा में कई स्थान पर लोहे की जंजीर डलवा दिया | इन जंजीरों के कारण आवागमन करने वाले पानी के जहाजों को काफी नुकसान होने लगा |  अंत में हारकर ब्रिटिश सरकार को अपना फरमान वापस लेना पड़ा और मछुवारों को मछली पकड़ने की आजादी प्राप्त हो गई | इसी प्रकार से दुर्गा पूजा के समय पूजा के जुलूस पर यह कहते हुए पाबंदी लगा दी गई कि इससे शांति भंग होती है और जनता को असुविधा होती है | ब्रिटिश राज के इस हुक्म का उन्होंने कड़ा विरोध किया और हर पाबन्दी के बावजूद पूरे धूम-धाम से  दुर्गोत्सव मनाया गया | इसमें जनता ने भी रानी का साथ दिया |  जनता के अकड़े विरोध के कारण ब्रिटिश राज ने अपना यह फरमान भी वापस लिया | जनता के हित के लिए अंग्रेजी हुकूमत से उनका हमेशा विरोध रहा |
     सुंदरवन के कुछ क्षेत्र के मालिक प्रिंस द्वारकानाथ टैगोर ने ब्रिटेन जाने के लिए अपनी कुछ जमीन को रानी रासमणि के पास गिरवी रखा | (यह क्षेत्र वर्तमान दक्षिण 24 परगना जिला के संतोषपुर और उसके आसपास का क्षेत्र है) | उन दिनों इस क्षेत्र में आबादी नहीं के बराबर थी | कुछ असामाजिक तत्वों का यहाँ बसेरा हुआ करता था | इस क्षेत्र में मछुवारों को मत्स्यपालन के लिए प्रोत्साहित किया और उनका भरपूर सहयोग किया | धीरे-धीरे यहाँ मत्स्यपालन के कई छोटे-छोटे केंद्र विकसित हो गए | इस क्षेत्र में बसे हुए असामाजिक तत्व भी समाज की मुख्य धारा में शामिल होकर मत्स्य पालन के कारोबार में लग गए | उनके इस प्रयास ने समाज सुधार की दिशा में एक क्रांतिकारी परिवर्तन किया |
     सन 1855 में  उनका देहावसान हो गया | कलकत्ता के कई हिस्से में उनके नाम की सड़कें और भवन आदि आज भी उनकी याद दिलाती हैं | उनके सम्मान में भारतीय डाक विभाग द्वारा डाक टिकट भी जारी किया गया | समय के साथ उनका पुराना निवास आज जर्जर हालत में पहुँच चुका है | हालाँकि कलकत्ता नगर निगम ने इस हवेली की देखरेख का जिम्मा उठाया है पर अभीतक जीर्णोद्धार की प्रक्रिया प्रारम्भ नही हो पाई है |
     उनके द्वारा दिए गए समाज सुधार के कार्य, अंग्रेजों से भारतीयों के हक़ के लड़ाई और स्वाभाव के कारण वो सदैव पूजनीय रहेंगी |

शुक्रवार, 15 जुलाई 2016

तुम्हारे बाद



      खबर आयी कि 'बाबा' का अस्पताल में देहांत हो गया है | खबर ऐसी कि कानो को विश्वास न हो | पर सत्य सामने था, जिसपर अविश्वास नहीं किया जा सकता था | सभी लोग अस्पताल की तरफ भागे जहां  'बाबा' ने अंतिम साँसे ली थी | अस्पताल की साड़ी औपचारिकताएं ख़त्म कर रात बारह बजे उनके पार्थिव शरीर को उनके घर लाया गया | कड़ाके की ठण्ड पद रही थी | हिन्दू रिवाज के अनुसार किसी के भी पार्थिव शरीर को घर के अंदर नहीं ले जाया जाता है | रखने के लिए बहुत जद्दोजह के बाद तय हुआ कि मकान की ड्योढ़ी पर लिटा दिया जाए | समय के अनुसार परिवार के अधिकाँश लोग साथ में बैठे रहेंगे, उजाला होने तक | सुबह की पहली किरण के साथ उनके अंतिम यात्रा की तैयारी किये जाने का विचार बना |

      उनके पुत्र कोई था नहीं | दो बेटियां थी जो पास-पास ही रहती थी | रिटायरमेंट और बुढ़ापे के कारण बाबा एवं उनकी पत्नी अपनी बेटियों पर आश्रित थे, पर उनके नाम कुछ जमा पूंजी अवश्य थी ,कुछ रकम पेंशन के रूप में मिल जाती थी | एक जमीन का टुकड़ा था जिसपर आवश्यकता से अधिक मकान बने हुए थे | गाँव पर भी संयुक्त परिवार में कुछ जमीने थी जो बाबा के नाम पर थी | इन सबके भरोसे बाबाजी ने अपने और अपनी पत्नी के लिए बुढ़ापा काटने की योजना बनाया था, पर हां री किस्मत, इंसान सोचता कुछ और है, होता कुछ और है |

      धीरे-धीरे सारे परिचित एवं रिश्तेदार जमा होने लगे | बाबाजी के छोटे भाई के लड़के भी उसी मुहल्ले में रहते थे | वो लोग भी पूरा परिवार सहित आ जुटे | एक तरफ गाँव- समाज के सारे लोग इकठ्ठा होकर अंतिम यात्रा के लिए तैयारियां करने में लगे हुए थे वहीं दूसरी तरफ कुछ महिलाएं गपशप में लगी हुई थी | उनके से एक ने कहा कि मुखाग्नि तो बेटा द्वारा दिया जाना चाहिए | यदि बेटा नहीं है तो भतीजे द्वारा दी जानी चाहिए | यहाँ तो उल्टी गंगा बाह रही है | बेटा नहीं है तो क्या हुआ , भतीजा को ही आगे बढ़कर मुखाग्नि देना चाहिए | यदि दामाद अथवा दामाद के पुत्र द्वारा  मुखाग्नि दी जाती है तो दिवंगत आत्मा को मुक्ति नहीं मिलेगी  | जितने मुह उतनी सलाहें | तभी किसी ने कहा कि 'बाबा' की संपत्ति पर बेटियों का पहला हक़ होता है | यदि मुखाग्नि बेटी की तरफ से नहीं दिया गया तो हो सकता है कि उनकी संपत्ति में बेटी- दामाद को कोई हिस्सा ना मिले , इसलिए अच्छा होगा की हर हाल में यह सेवा बेटी के पुत्र (नाती ) द्वारा ही दिया जाना चाहिए ,चाहे कुछ भी हो जाए |  वैसे तो कानूनन जायदाद में बेटियों का हक़ बनता है पर क्या पता यदि भतीजे ने सबके सामने मुखाग्नि दिया तो पंचों का मत भतीजे की तरफ हो जाए और फिर जायदाद में भतीजे को हिस्सा देना पड़े | अंतिम यात्रा की तैयारियां चलती रही, साथ ही तर्कों- वितर्कों का माहौल भी |

      हकीकत में 'बाबाजी' के भतीजे अंतिम बार बाबाजी के नौकरी से सेवानिवृति के दिन आये थे , उस दिन घर के प्रत्येक सदस्य को उन्होंने कुछ ना कुछ उपहार दिया | किसी को गहने तो किसी को  नकद धनराशि | उसके बाद आज का दिन है जब उनके अंतिम यात्रा के समय | बाबाजी की विधवा घर के के कोने में बैठी इन सब चर्चाओं से दूर , रो- रो कर  उनके आँखों के पानी भी जैसे सूख गए हों , गला भी सूख गया हो ऐसा जान पड़ता था | ना तो करूण  विलाप की आवाजें ना ही आंसुओं की धारा | लग रहा था जैसे जड़ हो चुकी हो | बस हलके से हिलते हुए होठ इतना ही बयान कर पा रहे थे , “मेरे जाने से पहले ही तुम क्यों चले गए, अब मेरा क्या होगा, किससे लड़ूंगी, किसे अपनी बातें सुनाऊँगी |” उनकी दशा देख कुछ पुरानी  यादें जैसे ताजी हो चली | ऐसे जीवंत इंसान , जहाँ भी जाते थे शमा बांध जाती थी | बुजुर्ग हो या बालक , सभी उनकी अदाओं के कायल थे | हर तरफ उनका सम्मान होता था | 'माताजी' यानी 'बाबाजी' की पत्नी भी जैसे करुणामयी की रूप हों | धार में बहले ही कितना भी अभाव हो , लेकिन हर आगंतुक की सेवा को सदा तत्पर रहती थी | कोई भी ऐसा व्रत -त्यौहार नहीं था जिसे मनाते ना रहे हों | ईश्वर भी ना जाने क्या क्या करता है | यह तो सत्य था बाबाजी के जाने के बाद माताजी की दशा के बारे में सोच पाना भी असहज बना देता था |

      जैसे तैसे समस्त तैयारी के बाद बाबाजी का अंतिम संस्कार किया गया | चर्चाओं से जैसा जाहिर था, भतीजे चाह कर भी मुखाग्नि ना दे सके | प्रमाण के रूप में समस्त घटनाक्रम का फोटोग्राफी किया गया | सब कुछ समाप्त होने के बाद मेहमान अपने घर चले गए , पड़ोसी अपनी दुनिया में खो गए | कुछ दिनों के बाद मैं माताजी से मिलने उनके घर गया | बाहर चारपाई पर कंकाल के रूप में एक महिला को बैठा देखा | वक्की पहचान नहीं पाया कि ये वही माताजी हैं जिनसे मिलते ही मुस्कराहट और मिश्रित बातों की झड़ी ऐसी लग जाती थी कि समय का बीतना पता ही नहीं चलता था | मैं पास गया और उनसे हाल पूछा | करुण क्रंदन के साथ उन्होंने शुरू किया ,”बेटा देखो कैसे धोखा देकर चले गए | बोला करते थे कि तुम्हारा अंतिम संस्कार किये बिना इस दुनिया से नहीं जाऊंगा | सदा सुहागन रहने के लिए मैंने क्या-क्या नही किया | जिसने जो भी सिखाया वही सब पूजा पाठ किया | पर अंत में इतना धोखेबाज निकलेगा मैंने सोचा भी न था | देखो अकेले छोड़ कर खुद निकल लिए |क्या बिगाड़ा था मैंने उनका या फिर भगवान का |” उन्होंने खाना- पीना सब छोड़ दिया था | तीन-तीन दिन बीत जाता था , लेकिन कुछ खाना नहीं चाहती थी | समय के साथ- साथ आग्रह कर खिलाने वाला भी कोई ना था | सब अपनी दुनिया में मस्त थे | अब बेचारी बुढ़िया के लिए वक्त था भी किसके पास | जिसे जो लेना था , जिसे जो मिलना था वह सब तो अब ख़त्म हो चुका था | फिर मतलब क्या था | बस एक लोकलाज था जिसक कारण लोग उनको ढो रहे थे | मैंने बहुत आग्रह किया , चलो मेरे हाथ से एक रोटी ही खा लीजिये | अनुनय- विनय के बाद थोड़ी सी रोटी खा सकी | अब तो बस एक ही रट थी | बेटा तुम्हारे बाबा बुला रहे हैं , बहुत कष्ट में है , मुझे जाना होगा | बस इस धारा का भोग कुछ ही दिन और लिखा है | मैंने बहुत समझाना चाहा कि फिर से जीवन को सवाँरे | अपना मन हम सब में लगाये | पर एक ही धुन थी | उनके बाद अब और कुछ नहीं , बस अब जाना है बेटा |

      और फिर कुछ दिन के बाद एक खबर आयी | माताजी चल बसी | फिर से वही भावनाओं का ड्रामा चला होगा | अपने अनुसार सबने उनके जाने पर दुःख व्यक्त किया होगा , पर मुझे लगा जैसे सपने में आ कर कह रही हों, “बेटा मैं चली उनके पास , अब जाकर चैन आया है |” उन दोनों जनो  के जाने के बाद एक शून्य का अहसास तो होता है , पर लगता है जैसे माताजी मई मृत्यु नहीं , उन्हें एक नया जीवन मिल गया है |    



_ बिनय कुमार शुक्ल

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

आत्मदान - दीपक साव

                           आत्मदान बन जाए 
                          परिचय जीवन का ,
                          समर्पित कर दूँ ,
                       संचय जीवन का । 
शेष नहीं , शून्य बन जाए ,
अर्थहीन विचरण जीवन का । 
कल्पनावर्ण संशय जीवन का ,
 आधारशिला निर्माण ढूंढ रही  ,
तेरे निलय में मेरे दर्पण का । 
                                        कोमल मन पर ,शीला लेख है ,
                                        अनुच्छेद क्रम भूला प्रण का ,
                                         यत्र-तत्र समेत रहा हूँ ,
                                        शब्दकोश तेरे विवरण का ।  

पतंग - बानी शुक्ल

आशा की उड़ान
एक अनकही पहचान,
न डर , न खौफ
बस स्वछंद उड़ान ।
हर कोने की सैर ,
इस आसमान से उस आसमान तक ,
चिड़ियों से बाते ,
क्षितिज से मुलाकातें ,
कभी इस छोर , कभी उस छोर ।
इस तंग जहां से ,
आसमां की ओर ।
कभी हवा का झोंका ,
तो कभी बादलों ने रोका ,
बस उड़ना ही जाने ,
और उड़ने के बहाने .........